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भ्रष्टाचार एक अभिशाप

Posted On: 10 Oct, 2011  
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जियो बहादुर खद्दर-धारी (नेता )

Posted On: 27 Sep, 2011  
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बदलते रिश्ते

Posted On: 16 May, 2011  
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वतन से मोहब्बत ईमान की निशानी है : हज़रत अली(अ.स.)

Posted On: 22 Dec, 2010  
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शादी के लड्डू

Posted On: 1 Dec, 2010  
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भारत हम सब का है, हम सब भारत के

Posted On: 6 Oct, 2010  
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12 Comments

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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ज़रा इन लेखों पर गौर फरमाइए... ""साहित्य के क्षेत्र में ब्रांड होते ही आदमी ‘भोगे हुए यथार्थ’ की बात भूल जाता है और नई प्रतिभा को प्रेरित करने का काम छोड़ देता है। उसके विरोध के स्वर भी धीमे पड़ जाते हैं। सफल होते ही लेखक दावतों और सम्मान समारोहों में डूब जाता है। सेलिब्रिटी सर्कस में सारा जुनून स्वाहा हो जाता है।" "किताबें कायरता रचें, इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम किताबों के बादलों से गुजरते हैं, परंतु न तो उनकी नमी हमें छूती है और न हम उसमें छिपी बिजली को थामने का प्रयास करते हैं? क्या हम पढ़ाई के नाम पर केवल रस्म अदायगी कर रहे हैं, जैसे हमारी प्रार्थनाएं केवल निजी डरों से प्रेरित हैं और हमारे पश्चाताप भी कपड़ों का मैल निकाले बिना मात्र पानी में डुबाकर सुखाने की तरह हैं, जैसा कामचोर कपड़े धोने वाली करती है? हम तो गंगा में भी सुरक्षा का रेनकोट पहनकर डुबकी लगाते हैं।" "यह भारतीय विशेषता है कि हम विदेश जाकर या देश में रहकर विदेशी कंपनी का काम बड़ी लगन और ईमानदारी से करते हैं, परंतु राष्ट्र का काम या भारतीय सरकार में नियुक्त होते ही आलसी और बेईमान हो जाते हैं। क्या इसका यह अर्थ है कि हम श्रेष्ठ गुलाम और निकृष्ट स्वतंत्र लोग हैं?" ये आलेख मेरे नहीं हैं पर इस स्तर के आस-पास का एक भी आलेख मुझे यहाँ नहीं मिला आप खुद अंदाज़ा लगाइए कि सिर्फ लिखने के लिए लिखना कहा तक उचित है... क्यों ना पाठक ही बना जाये मेरे तरह...

के द्वारा: mayurkota mayurkota

के द्वारा:

सैयदभाई नमस्कार आपने अपना फर्ज निभाया है । ऐसे लेख समय समय पर लिखने ही पडेंगे । आप के माध्यम से मैं अपनी बात रखना चाहुंगा । भ्रष्टाचार दो तरह का है, बडा और छोटा । छोटा भ्रष्टाचार रिवाज बन गया है । लोगों ने ईसे सर्विस टेक्ष के रूप मे स्विकार कर लिया है । लोगों को शोर्ट कट चाहिये मारो कुछ रुपये मुह पे और अपना काम निकाल लो । ज्यादातर जबरदस्ती मांगा जाता है, कोइ किस्से में लोग खुश हो के बिना मांगे दे देते हैं । ये जरूर भारत के अंदर के अर्थतंत्र का बेलेंस बिगाडता है , कुछ लोगों को खूश करता है कुछ को दूख देता है, लेकिन ये बडा नूकसान नही है । भारत का धन भारत में ही समा जाता है । आलिया का पैसा मालिया के पास, लालिया का कालिया के पास । बडा भ्रष्टाचार तो भारत के धन को भांप बना के उडा देता है । सारा कॅश विदेश चला जाता है । फीर यहा केश की कमी के नाम पर नया कॅश छापा जाता है । बिना ठोस कारण कॅश छापने से मेहन्गाई भी भडक जाती है । जरूर ये खेल खतम होगा ऐसी कामना ही हम कर सकते हैं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा:

सईद भाई ,सादर नमस्कार, अन्नाजी का आन्दोलन को व्यापक समर्थन मिलने का क्या कारण था?यही ना की देश का आमिर, गरीब और सरकारी भाषा में गरीबी रेखा के निचे वाला भी सभी इस बिमारी से त्रस्त है. दुःख इस बात का है की माल लेने वाला व्यक्ति कहता है ये तो हक़ है मगर जब उसी को माल देना पड़ता है तो कहता है यह भ्रष्टाचार है. इस अभिशाप से बचना है तो हम को खुद को ही सुधारना होगा,भ्रष्ट व्यक्ति के परिवार वालों को उसे प्रताड़ित करना होगा, तभी शायद आज निरंकुश होता भ्रष्टाचार थम सके. मुझे आदरणीय राजकमल जी द्वारा पेश उदाहरण से इत्तेफाक है की कई व्यक्ति काम हो जाने के बाद आत्म संतुष्टि के लिए भी कुछ न कुछ उपहार दे ही जाते हैं. भाई ठीक तो है "लें दें" मगर कुछ लोग यहाँ भी ऐसे हैं की "लें दें" पर आपत्ति करते हैं. भाई साहब अच्छे आलेख के लिए बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय निशाजी ,.सादर प्रणाम आपका कहना बिलकुल सही है ,.हम भी इसको बढ़ावा दे रहे हैं ,..जैसा आदरणीय गुरुदेव जी ने प्रत्यक्ष उदाहरण ही दे दिया....मैं भी आप दोनों से कुछ कहने की आज्ञा मांगता हूँ ,.. हमारा(आम आदमी) जब कोई बहुत मुश्किल काम हो जाता है ,.तो ख़ुशी इतनी होती है की प्यार से थैला भर ही जाता है ,..(बिना पैसा दिए सरकारी काम होना तो मुश्किल ही है ),...इसमें एक छुपा हुआ डर भी रहता है कि यदि साहब को प्यार नहीं दिया तो कहीं अगली बार जरूरत पड़ने पर गड़बड़ ना हो जाये .. बाकी आजकल तो हर आदमी बेईमान है ,..पूरा ईमानदार को जगह जगह जिल्लत झेलनी पड़ती है ,...कोई नहीं सुनता उनकी,..कई तो अवसादग्रस्त तक हुए हैं ,.क्योंकि लोग उसे सनकी समझने लगते हैं ,.. मैं एक बात विश्वास से कह सकता हूँ कि कभी यदि नियति ने हम सबको सुधरने का मौका दिया तो सब जरूर सुधरना चाहेंगे ,..ये "चमत्कार" ही होगा,...लेकिन कब ???????????....असली चिंता यहीं से शुरू होती है ..आप दोनों को पुनः सादर प्रणाम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

प्रिय सैयद भाईजान आदाब ! यह मां की इस रावण से हम सभी दुखी है लेकिन हम लोगो की मानसिकता की एक बात बताता हूँ .... मेरे स्वर्गीय पिता जी जूनियर इंजीनियर थे ..... जब भी किसी का बिना पैसा लिए काम होता था तो वोह जबरदस्ती घर में छल्लिया +गन्ने +साग +गाढ़े दूध की कुलफिया +गुड की पट्टी वगैरह यह कह कर दे जाते थे की शर्मा जी यह हमारा प्यार है .....आपने हमार बिना फ़ीस के काम कर दिया है तो हमने खाने का समान दिया है ..... यह काम करवाने के लिए नहीं बल्कि काम हो जाने के बाद दिया है , इसलिए आप इसको गलत नियत से दिया नहीं कह सकते -इसको तो आपको लेना ही पड़ेगा ...... यह उदाहरण हमारी मानसिकता को दर्शाता है की हम खुद भी बिना कूच दिए बिना काम न करवाने के किस प्रकार आदि हो गए है ..... भ्रष्टाचार हमारी रग -२ रच बस गया है .....इसलिए इससे छुटकारा कोई चमत्कार ही दिलवा सकता है ..... एक अच्छी पोस्ट पार मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

प्रिय सईद भाई, सादर वन्देमातरम| इसमे कोई शक नहीं की कर्बला में इमामे हसन को शहीद कर देने वाली यजीद की नापाक फौजें आज भी ज़िंदा हैं|कुरआन चीख चीख कर कहता है की वतन आधा ईमान है लेकिन मौलाना सब गडबड कर देते हैं और इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी सियासती तंजीम की है जिसने हमारे मुल्क पर अर्से तक हुकूमत किया, आज भी कर रही है और लोगों को बेवकूफ बनाकर आगे भी करती रहेगी|मेरा पक्का विश्वास है की एकता कभी भी अनेकता के तत्वों को उद्घाटित करने से स्थापित ही नहीं की जा सकती|ईश्वर, ईश्वर है, अल्लाह, अल्लाह है दोनों में पर्याप्त भिन्नता है फिर भी एकता है लेकिन जब भी रामल्ला और रम्खुदैया किया गया है, तब तब हमारी एकता की भावना को ठेस पहुंची है|राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं में हम बड़े प्रेम से एक गीत गाते हैं ...... अरे ओ मौजी बड़े प्रेम से अपना धर्म निभाओ तुम| धूमधाम से ईद मनाकर खूब मलीदा खाओ तुम| किसी गैर से हाँथ मिलाकर गैर नहीं कहलाओ तुम| माँ की लाज बचाने वालों माँ की लाज बचाओ तुम| मतलब आज नया निकला है, आंसी और अजान का| नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पकिस्तान का|...एक अत्यंत ही सार्थक और समीचीन आलेख के लिए कोटिशः आभार|जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

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के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: syeds syeds

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

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सैयद जी...... सर्वप्रथम तो आपको इस बेहतरीन शिक्षाप्रद लेख के लिए साधुवाद........ असल में धर्म तो मार्ग है...... उस परमत्व को पाने का...... जिस हेतु हमने मानव शारीर धारण किया है...... लेकिन हममे से अधिकतर लोग इस सत्य को पहचान ही नहीं पाते...... और भटक जाते हैं...... कोई भी धर्म...... विद्वेष की बात ही नहीं करता...... लेकिन अज्ञानी शब्दों को पकड़ लेते हैं...... और तत्व की उपेक्षा कर देते हैं....... रामकृष्ण परमहंस ने हिन्दू, बौध, इस्लाम सभी मार्गों से उस परमत्व को प्राप्त करने में सफलता पाई थी...... इस कार्य को करने वाले वे एकमात्र व्यक्ति हैं....... और अंत में बच्चन जी की कविता याद आती है..... अलग अलग पथ बतलाते सब...... रह पकड़ तू एक चलाचल पा जायेगा मधुशाला...... एक बार फिर आपको सप्रेम साधुवाद...... इसी प्रकार लिखते रहिएगा......

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

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के द्वारा: RASHID - Proud to be an INDIAN RASHID - Proud to be an INDIAN




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